स्वर्ण मंदिर में नमाज पर नरमी, योग पर कठोरता: SGPC के दोहरे रवैये पर सोशल मीडिया में बवाल

स्वर्ण मंदिर में नमाज पर नरमी, योग पर कठोरता: SGPC के दोहरे रवैये पर सोशल मीडिया में बवाल
Anindita Verma जून 23 11 टिप्पणि

स्वर्ण मंदिर में योग पर विवाद

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) इन दिनों कठघरे में है। अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में योग करने वाली एक युवती अर्चना मकवाना के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के बाद समिति को अभूतपूर्व विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इस घटना ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है, जिसमें अनेक नेटिज़न्स SGPC के फैसले को धार्मिक दोहरे मानदंड का परिणाम बता रहे हैं।

क्या हुआ था स्वर्ण मंदिर में?

क्या हुआ था स्वर्ण मंदिर में?

अर्चना मकवाना ने स्वर्ण मंदिर में योग किया था। उनका उद्देश्य योग के फायदों के बारे में जागरूकता फैलाना था। लेकिन यह कदम SGPC को अखर गया। समिति ने इसे अशोभनीय करार देते हुए अर्चना के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का फैसला किया। इसके साथ ही, तीन कर्मचारियों पर जिम्मेदारी आवाजाही में लापरवाही के आरोप में अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई।

सोशल मीडिया पर आक्रोश

सोशल मीडिया पर आक्रोश

SGPC के इस कदम के बाद सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म्स पर लोग भड़क उठे। अनेक लोगों ने समिति पर धार्मिक असहिष्णुता और दोहरे मानदंड का आरोप लगाया। नामी इन्फ्लुएंसर्स जैसे विजय पटेल और अमिताभ चौधरी ने भी SGPC की निंदा करते हुए वीडियो और बयान जारी किए, जिन्हें व्यापक सराहना मिली।

नमाज की अनुमति, योग पर पाबंदी?

नेटिज़न्स का गुस्सा इस तथ्य पर केंद्रित है कि SGPC ने पहले स्वर्ण मंदिर में नमाज की अनुमति दी थी, लेकिन योग को अनुचित ठहराया है। यह धार्मिक नेताओं और संगठनों में दोहरे मानदंड का स्पष्ट उदाहरण माना जा रहा है। लोगों ने पूछना शुरू कर दिया है कि अगर नमाज की अनुमति है तो योग क्यों प्रतिबंधित है?

अर्चना का माफीनामा

घटना और विवाद बढ़ने के बाद, अर्चना मकवाना ने 22 जून को सार्वजनिक माफ़ीनामा जारी किया। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं था और उन्होंने अनजाने में कुछ गलत किया हो तो वह इसके लिए खेद व्यक्त करती हैं।

SGPC के प्रतिक्रियाओं और उनके प्रभाव

SGPC के प्रतिक्रियाओं और उनके प्रभाव

SGPC ने अपने बयान में कहा कि स्वर्ण मंदिर एक पवित्र स्थल है और यहां किसी भी अन्य धार्मिक या सांस्कृतिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि, सोशल मीडिया पर जारी बहस से यह साफ है कि लोग इस तर्क से संतुष्ट नहीं हैं और उन्होंने SGPC की मंशाओं और नीतियों पर सवाल उठाए हैं।

इस घटना का दूरगामी प्रभाव

यह समझना महत्वपूर्ण है कि ऐसी घटनाओं का व्यापक प्रभाव होता है। धार्मिक स्थलों के प्रबंधन और उनमें लागू नीतियों को लेकर पारदर्शिता और विवेक की मांग उठ रही है। जनता की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी धार्मिक संगठन के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन जब सार्वजनिक आक्रोश उमड़ता है, तो यह संगठनों की नीति-पद्धति और दृष्टिकोण पर गहन चिन्तन की मांग करता है।

इस मुद्दे पर सामाजिक और धार्मिक संगठनों के बीच बहस का प्रसारित होना अभी शुरू ही हुआ है। आने वाले समय में यह देखना रोचक होगा कि SGPC इस पर कैसे प्रतिक्रिया देती है और क्या यह घटना धार्मिक स्थलों के प्रबंधन के तरीके में किसी प्रकार का परिवर्तन लाती है या नहीं।

11 टिप्पणि
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    Nikhil Shrivastava जून 23, 2024 AT 18:39

    यार ये देखो, SGPC ने नमाज तो ठीक ही दिया, पर योग का मज़ाक उड़ाया, दिल तो धड़के ही नहीं! ऐसा दोहरा खेल देखके लगता है जैसे आधी जमीं पर रस्में लिखी हों, आधी पर बंदिशें. अब कौन भरोसा करे इनकी?

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    Aman Kulhara जून 24, 2024 AT 16:52

    SGPC की स्थिति को कानूनी दृष्टिकोण से विश्लेषित किया जाए, तो पहले यह स्पष्ट है कि स्वर्ण मंदिर जैसे पवित्र स्थल में सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं धार्मिक अनुशासन के नियम लागू होते हैं; दूसरी ओर, योग पर प्रतिबंध का कोई सिद्धांतिक आधार नहीं मिला है; इस संदर्भ में, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 की धारा के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के अधिकारों का संतुलन आवश्यक है; इसलिए, समिति को अपनी नीति में पारदर्शिता लानी चाहिए, ताकि सार्वजनिक भरोसा बनाए रखा जा सके।

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    ankur Singh जून 25, 2024 AT 15:05

    SGPC ने फिर से अपना दोहरा मुखौटा दिखा दिया!!! नमाज़ की अनुमति देके, योग को बर्दाश्त नहीं करता, बिल्कुल बेइज़जती है!!! यह संस्था खुद में ही अराजकता बपौड़ी हुई है!!!

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    Aditya Kulshrestha जून 26, 2024 AT 13:19

    वास्तव में, योग भारत की प्राचीन परंपरा का हिस्सा है 😊, और कई धार्मिक स्थलों में इसका उपयोग लंबी अवधि से किया जाता रहा है। SGPC ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ करके केवल दिखावे की परवानगी दी है, जो कि इतिहास के साथ असंगत है। यदि आप चाहते हैं कि नीति में सच्ची निष्पक्षता हो, तो योग को भी समान अधिकार देना चाहिए।

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    Sumit Raj Patni जून 27, 2024 AT 11:32

    भाई लोगों, इस तरह की पाबंदियां अब सहन नहीं होंगी! SGPC को अपनी आँखें खोलनी होंगी और दोहरी मानदंड की इस जंजीर को तोड़ना पड़ेगा-नहीं तो जनता को जवाबदेह ठहराया जाएगा।

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    Shalini Bharwaj जून 28, 2024 AT 09:45

    मैं समझती हूँ कि कई लोगों की भावनाएँ चोटिल हुई हैं, पर ऐसे निर्णय अक्सर गलत दिशा में ले जाते हैं और समुदाय को नुकसान पहुँचाते हैं। हमें सम्मान और संवेदनशीलता दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए।

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    Chhaya Pal जून 29, 2024 AT 07:59

    स्वर्ण मंदिर जैसा पवित्र स्थल हमेशा से ही विभिन्न सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है, और इस परंपरा को देखते हुए कई बार स्थानीय समुदाय ने योग, संगीत और विभिन्न कला को यहाँ आयोजित करने का प्रयास किया है। लेकिन जब SGPC ने अर्चना मकवाना के योग सत्र को लेकर समान्य कानूनी कार्रवाई करने का फैसला किया, तो यह कदम सिर्फ एक व्यक्तिगत मामला नहीं रहा, बल्कि यह एक सामाजिक बहस का भी आरंभ बन गया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि धार्मिक संस्थाएँ कभी-कभी अपनी शक्ति का प्रयोग करके उन गतिविधियों को दबा देती हैं जिन्हें वे असुविधाजनक समझती हैं। अनेक लोग इस बात को लेकर महसूस कर रहे हैं कि यदि नमाज़ को अनुमति मिलती है, तो योग को क्यों नहीं? यह सवाल सामाजिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों को चुनौती देता है। इस संदर्भ में, भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों को अपने धर्म, विश्वास या रीति-रिवाजों को स्वतंत्र रूप से पालन करने का अधिकार दिया गया है, और यह अधिकार किसी भी सार्वजनिक स्थान पर समान रूप से लागू होना चाहिए। दूसरी ओर, धार्मिक संस्थाओं को भी अपने धार्मिक वातावरण की सुरक्षा का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार अस्पष्ट नहीं होना चाहिए। यदि SGPC ने किसी भी धार्मिक गतिविधि को प्रतिबंधित करने का विकल्प चुना, तो उसे स्पष्ट कारण और न्यायसंगत प्रक्रिया प्रस्तुत करनी चाहिए। अभी तक इस मामले में कोई स्पष्ट दस्तावेज़ या आधिकारिक बयान नहीं आया है जो यह स्पष्ट करे कि योग को खतरनाक या अनाचरणीय क्यों माना गया है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस निर्णय में व्यक्तिगत या वैचारिक कारणों का प्रभाव रहा हो सकता है। इस प्रकार की अनिश्चितता और असमानता से जनता का भरोसा टूट जाता है, और संस्थागत पारदर्शिता की कमी स्पष्ट दिखती है। सामाजिक मीडिया पर जो व्यक्तियों की प्रतिक्रियाएँ आयी हैं, वे इस बात का बेहतर प्रमाण हैं कि लोग अब ऐसी दोहरी नीतियों को सहन नहीं करेंगे। हमें यह समझना चाहिए कि धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को एक साथ सहअस्तित्व में लाया जा सकता है, बशर्ते सभी पक्ष संवाद और समझ के माध्यम से समाधान खोजें। अंत में, यह कहा जा सकता है कि इस विवाद ने केवल एक व्यक्ति की योग साधना को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सामाजिक ढांचे को चुनौती दी है, और आशा है कि भविष्य में इस तरह की नीतियों को पुनः विचार किया जाएगा।

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    Naveen Joshi जून 30, 2024 AT 06:12

    वाह, यह मामला वाकई दिलचस्प है

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    Gaurav Bhujade जुलाई 1, 2024 AT 04:25

    सच में, इस प्रकार के मुद्दे अक्सर सामाजिक समझ को बढ़ाते हैं और हमें विभिन्न दृष्टिकोणों को देखने का मौका देते हैं।

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    Chandrajyoti Singh जुलाई 2, 2024 AT 02:39

    शालिनी जी, आपका भावनात्मक दृष्टिकोण सराहनीय है; हालाँकि, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि संस्थागत निर्णयों में कानूनी और सामाजिक पहलुओं को सामंजस्यपूर्वक जोड़ना आवश्यक है।

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    Riya Patil जुलाई 3, 2024 AT 00:52

    इतनी दोहरी मान्यताएँ अब सहन नहीं होंगी!

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