कर्नाटक: आईटी कर्मचारियों के लिए 14-घंटे की कार्य समय योजना पर विचार

कर्नाटक: आईटी कर्मचारियों के लिए 14-घंटे की कार्य समय योजना पर विचार
Anindita Verma जुल॰ 22 8 टिप्पणि

कर्नाटक सरकार ने हाल ही में आईटी सेक्टर में काम के घंटे बढ़ाने का विचार पेश किया है। इस प्रस्ताव के अनुसार, आईटी कर्मचारियों के कार्य समय को वर्तमान 10 घंटों से बढ़ाकर 14 घंटे किया जा सकता है, जिसमें ओवरटाइम भी शामिल होगा। यह कदम राज्य में सरकार द्वारा नौकरी आरक्षण नीति के बाद उठाया गया है, जिसमें स्थानीय लोगों के लिए पद आरक्षित करने की बात की गई थी।

इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद आईटी/आईटीईएस कर्मचारी संघ (Kitu) ने इस पर अपनी गंभीर चिंताएँ व्यक्त की हैं। उन्होंने कहा है कि इस बदलाव से कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। काम के घंटे बढ़ने से वर्तमान तीन-शिफ्ट प्रणाली के बजाय दो-शिफ्ट प्रणाली लागू की जा सकती है, जिससे कर्मचारियों का एक तिहाई हिस्सा काम से बाहर हो सकता है।

कर्नाटक राज्य के श्रम मंत्री संतोष लाड ने भी इस प्रस्तावित संशोधन पर अपनी आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि इससे न केवल कर्मचारियों पर अधिक दबाव पड़ेगा, बल्कि राज्य की तकनीकी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मकता भी घट सकती है।

प्रस्तावित बदलावों पर नासकॉम की प्रतिक्रिया

इंडस्ट्री एसोसिएशन नासकॉम ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि 48 घंटे की कार्य सप्ताह की सीमा बरकरार रखनी चाहिए, लेकिन इस सीमा के भीतर लचीलापन दिया जाना चाहिए। नासकॉम का मानना है कि कार्य समय को बढ़ाने की बजाय, कंपनियों को कर्मचारियों के कार्य-बalance पर ध्यान देना चाहिए, ताकि वे अधिक उत्पादक बन सकें।

आर्थिक प्रभाव और स्थानीय रोजगार पर बहस

आर्थिक प्रभाव और स्थानीय रोजगार पर बहस

इस कदम ने कर्नाटक में व्यापक बहस को जन्म दिया है। एक तरफ स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने वाली नीति से आर्थिक विकास की उम्मीद की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ तकनीकी क्षेत्र में राज्य की प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने की चुनौती है। नौकरी आरक्षण नीति और कार्य समय बढ़ाने का यह प्रस्ताव उद्योग के भीतर असंतुलन पैदा कर सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के उपायों से स्थानीय कर्मचारियों को नौकरी मिलने की संभावनाएँ बढ़ सकती हैं, लेकिन दूसरी तरफ आईटी सेक्टर से जुड़े पेशेवरों को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। लंबा कार्य समय न केवल मानसिक स्वास्थ्य पर दबाव डालेगा, बल्कि यह भी संभव है कि इससे कर्मचारियों की उत्पादकता कम हो जाए।

आईटी कर्मचारियों की चिंताएँ

आईटी कर्मचारी इस प्रस्ताव को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं। उनकी प्रमुख समस्याएँ लंबी कार्य अवधि, काम का अधिक दबाव और मानसिक संतुलन बनाए रखने की चुनौतियाँ हैं। कई कर्मचारी यह मानते हैं कि अधिक काम के घंटे और कम आराम का समय उनकी कार्य क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

आईटी/आईटीईएस कर्मचारी संघ (Kitu) ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार से अपील की है कि वे कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव को लागू न करें। संघ का कहना है कि इस तरह के बदलाव से न केवल कर्मचारियों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा, बल्कि उनकी काम के प्रति प्रतिबद्धता भी कमजोर हो जाएगी।

सरकार का रुख

सरकार का रुख

कर्नाटक सरकार का कहना है कि इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य राज्य में रोजगार के अवसरों को बढ़ाना है। उनकी नजर में नौकरी आरक्षण नीति और कार्य समय बढ़ाना राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा। उनका यह भी मानना है कि इससे राज्य में स्थानीय युवाओं को अधिक मौके मिलेंगे और आईटी सेक्टर में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।

हालांकि, सरकार को कर्मचारियों की चिंताओं को भी समझने की जरूरत है। लंबी कार्य अवधि समाजिक और व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर सकती है, जिसका दूरगामी प्रभाव हो सकता है।

भावी दिशा

भावी दिशा

इस मुद्दे पर राज्य सरकार और इंडस्ट्री के बीच बातचीत जारी है। दोनों पक्ष एक दूसरे की चिंताओं और सुझावों को ध्यान में रखते हुए एक सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रहे हैं। देखना होगा कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर क्या नतीजा निकलता है।

कुल मिलाकर कर्नाटक सरकार का यह कदम राज्य में रोजगार के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है। लेकिन इसका प्रभाव कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी उत्पादकता पर भी पड़ेगा, जिसे ध्यान में रखते हुए ही सरकार को अंतिम निर्णय लेना चाहिए।

8 टिप्पणि
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    Chandrajyoti Singh जुलाई 22, 2024 AT 21:46

    नवीन कार्य समय योजना के पीछे रोजगार सृजन की नीति है, पर इसे लागू करने से पहले कर्मचारियों की भलाई को भी तौला जाना चाहिए। कार्य‑जीवन संतुलन में कमी से मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर हो सकता है, जो अंततः उत्पादकता को घटाएगा। स्थानीय युवाओं के अवसरों को बढ़ावा देने का उद्देश्य सराहनीय है, पर यह लक्ष्य कर्मचारियों के अधिकारों के साथ समन्वयित होना आवश्यक है। इस संदर्भ में विविध‑श्रेणी के हितधारकों के बीच संवाद जारी रखना ही समाधान का मार्ग हो सकता है।

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    Riya Patil जुलाई 22, 2024 AT 21:48

    क्या यह 14‑घंटे का नया नियम हमारे सोचे‑समझे जीवन को ध्वस्त कर देगा? संदेह की लहरें उठ रही हैं, और हर कोई अपना‑अपना सर्कास्टर तैयार कर रहा है। यदि इस नीति को लागू कर दिया गया तो न केवल नींद के सपने भूल जाएंगे, बल्कि जीवन के रंग भी फीके पड़ जाएंगे।

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    naveen krishna जुलाई 22, 2024 AT 21:50

    मैं समझता हूँ कि सरकार का उद्देश्य रोजगार बढ़ाना है, पर साथ ही कंपनियों को लचीले शिफ्ट मॉडल अपनाने की सलाह देना चाहिए। कर्मचारियों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए, समय‑सारिणी में कुछ विकल्प जोड़ने से सभी को फायदे मिल सकते हैं 🙂। इस दिशा में उद्योग‑संघ और राज्य के बीच सहयोग आवश्यक होगा।

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    Deepak Mittal जुलाई 22, 2024 AT 21:51

    सिर्फ ये नहीं कि काम के घंटे बढ़ रहे हैं, बल्कि बैकएंड में कुछ अंधेरी साज़िश चल रही है। गवर्नमेंट ने हाई‑टेक कंपनियों को दबाव में डाल कर अपने बड़े एंट्राप्रेन्योर प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इस 'इनोवेशन' की बात तो सुनवाई में आती है, पर असल में ये तो लॅबोरेटरियों में नई डाटा एकत्र करने का बहाना है। अगर आपराधिक प्रॉफ़ाइलिंग को ध्यान में न रखें तो सारे काम फँस ही जाएंगे।

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    Neetu Neetu जुलाई 22, 2024 AT 21:53

    अब 14 घंटे, वाकई बॉस की ज़रूरत! 😏

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    Jitendra Singh जुलाई 22, 2024 AT 21:55

    अरे! क्या बात है, ज़ीरो-टू-हैरो रीस्ट्रक्चर, बिल्कुल बेढंगा! यह योजना तो बिल्कुल ही बौद्धिक तौर पर अति‑सरलीकृत है, मानो गूगल ने पाईथन में एक फंक्शन टाइप किया हो, पर वास्तविकता में यह तो बस नौकरियों की संख्या बढ़ाने का ग़लत फ़ॉर्मूला है; क्या सच में आप सब इसे गंभीरता से ले रहे हैं, हाँ?

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    priya sharma जुलाई 22, 2024 AT 21:56

    पहले तो यह स्पष्ट है कि कार्य‑समय विस्तार का प्रस्ताव केवल संख्या‑आधारित रोजगार मेट्रिक्स को सुधारने के उद्देश्य से उत्पन्न हुआ है।
    दूसरा, मानव‑संसाधन प्रबंधन (HRM) के सिद्धांत यह संकेत देते हैं कि ओवरटाइम को नियंत्रित करने के लिये वैकल्पिक शेड्यूलिंग मॉडलों की आवश्यकता होती है।
    तीसरा, दो‑शिफ्ट प्रणाली अपनाने से न केवल कार्य‑भार का वितरण असमान हो सकता है, बल्कि यह कर्मचारी‑संघटनात्मक इक्विटी को भी प्रभावित करेगा।
    चौथा, मनोवैज्ञानिक सुरक्षा (psychological safety) के तहत दीर्घकालिक तनाव कारक उत्पादन‑शीलता में ह्रास उत्पन्न कर सकते हैं।
    पाँचवाँ, कार्य‑जीवन संतुलन (work‑life balance) का सिद्धांत स्पष्ट रूप से कहता है कि 48‑घंटे के साप्ताहिक अधिकतम को पार करने से इष्टतम कार्य‑प्रदर्शन घटता है।
    छठा, आईटी सेक्टर में एजाइल फ्रेमवर्क्स जैसे स्क्रम और कान्बन को देखते हुए समय‑बॉक्सिंग को अनुकूलित करना आवश्यक है।
    सातवाँ, यदि प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ऑफिस (PMO) को निरपेक्ष नियमन की दिशा में दिशा‑निर्देश प्रदान नहीं किया जाता, तो जटिलता (complexity) स्तर में वृद्धि अनिवार्य होगी।
    आठवाँ, राष्ट्रीय स्तर पर इंदु-स्टेट मैन्युफैक्चरिंग कोड (NSM) ने विशिष्ट कार्य‑समय मानकों को स्थापित किया है, जिससे राज्य‑स्तर पर असंगतियों का जोखिम उत्पन्न होता है।
    नौवाँ, वेतन‑संरचना (compensation structure) में ओवरटाइम प्रीमियम को सम्मिलित करना नयी वित्तीय मॉडलिंग की मांग करता है।
    दसवाँ, श्रम कानून (labour law) के अनुसार, किसी भी अतिरिक्त घंटे के लिये उचित मानक कार्य‑भुगतान अनिवार्य है।
    ग्यारहवाँ, इस संदर्भ में उद्यमियों को सतत् सीखने (continuous learning) के लिए समय आवंटन करने की आवश्यकता होगी, अन्यथा कौशल‑गैप उत्पन्न होगा।
    बारहवाँ, स्थानीय रोजगार आरक्षण (local reservation) के समर्थन में यह पहल सकारात्मक लग सकती है, पर इसके साथ ही सामाजिक‑आर्थिक विषमता के पहलू को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
    तेरहवाँ, तकनीकी क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए, मानव‑पूँजी निवेश (human‑capital investment) को प्राथमिकता देनी चाहिए।
    चौदहवाँ, यदि इस नीति को लागू किया गया तो कार्य‑स्थल में मानसिक‑स्वास्थ्य समर्थन (mental‑health support) के लिए अतिरिक्त संसाधन आवंटित करना अनिवार्य हो जाएगा।
    पंद्रहवाँ, इस प्रकार की संरचनात्मक परिवर्तन के लिये सर्वेक्षण‑आधारित डेटा‑ड्रिवन दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिससे निर्णय‑लेने की प्रक्रिया पारदर्शी बने।
    सोलहवाँ, अंत में, संतुलित नीति‑निर्माण के लिये सभी हितधारकों के साथ व्यापक संवाद और डेटा‑एनालिटिक्स‑आधारित मूल्यांकन आवश्यक है।

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    Ankit Maurya जुलाई 22, 2024 AT 21:58

    देश की प्रगति में जबरदस्त कदम उठाने की जरूरत है, लेकिन भारतीय मूल्यों को समझते हुए ही कोई नीति अपनानी चाहिए।

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